सरल है सुन्दर ,या सुन्दर है सरल ?
क्या मैला ठहरा जल बेहतर या विरल ?
कमल को तो ख्याति पूजा थाल में पात्र मिली,
कीचड को कोई श्रेह नहीं , तृष्णा क्यों केवल मात्र मिली ?
क्या जूनून यह क्या पक्षपात, क्यों सिर्फ निष्कर्षों से प्रेम अपार?
संकल्पना , आचरण और निष्पादन से क्यों नहीं है जुड़ता तार ?
श्रम का महत्व क्यों केवल कला के पूर्ण स्वरुप में खोजा जाता है ?
क्यों नहीं छेंनी की हर चोट , हथोडे के हर प्रहार को तौला जाता है ?
विदित है की परिणाम संघर्सों की परिभाषा है ,
संघर्ष को स्वयं मान मिले क्या इसकी नहीं कोई आशा है ?
अपने कर्मो का मापन क्यों परिणामो पर आधारित हो ,
साक्षात सम्पूर्ण सत्य - "कर्म" , भला क्यों व्यापारिक हों?
प्रलोभन का पोषण यह परिणामो की अंधी धुन करती है ,
इस बेसुध प्रतिद्वन्धता का फल यह धरती ही बस भरती है .
परिणाम भी निश्चित रूप से शोधन में विशिष्ट महत्व रखते है ,
केवल परिणामों पे केन्द्रीकरण किन्तु मूल धेय को विफल करते है .
एक ऐसी प्रशंशा , एक ऐसे अभिव्वाक्ति , एक ऐसी जागरूकता का निर्माण करे
जो हर कदम पे परिणामो और प्रयासों को एक सूत्र में बाँध एक सृजन शील संवाद करे !!