Friday, October 22, 2010
अकेला बीज
तिमिर विस्तृत , घुटन असीमित , जीवन का एक अंश नहीं है....
अपरिचित भयावह अन्धकार में , प्रकाश का परिद्रश्य नहीं है....
न कोई चाह न अभिलाषा , न मंजिल ,न कोई उद्द्देश्य ....
कैसा है यह अपरिचित सा , मौलिकता का अपिरिचित सा अभिन्न परिवेश...
पनप रहा हूँ न जाने कहाँ ? मेरा क्या है इस चकाचौंध भरी दुनिया में अस्तित्व?
इस कठोर सतह को भेद पाऊंगा क्या कभी? पा सकूँगा क्या कभी आत्मनिर्भरता का स्वामित्व?
चलो मान लेता हूँ भाग्य को देना पड़ेगा मेरा साथ , एक नन्हे पौधे का शायद मै लें भी लूँ आकार ....
पर क्या तब बचा रहूँगा सर्वत्र व्यापत इस आंधी से , क्या झेल सकूँगा इस नयी नवेली आधुनिकता के प्रहार ?
जन्म लूँ और फिर दिया जाओं कुचल , नहीं ,कभी नहीं !! क्या नहीं बेहतर पड़ा रहूँ मृत किन्तु सुरक्षित ?
पर फिर वो सौंधी धूप , वो रंगीन हवा , वो चंचल पानी सब मेरे जीवन में कैसे होंगे भला परिभाषित?
उफ़ यह उलझन , यह डर , यह संदेह , यह सब विचलित करते विचारों के निर्मम प्रहार !!
किस युक्ति से मिलेगा मेरे इन कोमल , अद्भुत , नन्हे सपनो को एक विस्तृत आकार??
अपनी ख्वाहिसों को विवाद करते सुनता हूँ यदा कदा , व्यवहारिकता के दंभ से ...
जब भी देखा है, मैने पाया है सपनों को बंधते ही, इस ढकोसले बाज़ व्यवहारिकता के स्तम्भ से....
इस निर्जीव उपस्थिति से भला और क्या बुरा , एक संघर्षशील इकाई का अंत होगा ??
ह्रदय में प्रयास की संतुष्टि और बहुत संभव , निज अर्जित सफलता का दंभ होगा !!
अब बस येही विचार लिए , मै नन्हा सा अकेला बीज , आज अपने सपनो में रंग भरता हूँ....
एक विशाल समर्थ वृक्ष बनने की ओर , संतुलित किन्तु स्थिर " वोह पहला पग " भरता हूँ......
हे सूर्य तेरी इन झिलमिलाती गोटों जैसी किरणों का अब मेरे जीवन में एक नवीन ही अर्थ होगा ...
जल बूंद , गाँठ बाँध ले यह बात की तेरी उपस्थिथि मात्र से , मेरा एक भी प्रयास न अब व्यर्थ होगा.....
असफलता की यह झूठी काया , कृत्रिम सौन्दर्य की यह मोह माया , अब विचलित नहीं मुझे कर पाएगी....
इन सब अव्रोध्नो को धवस्त करते , उन नए आयामों की संरचना से ही , सफलता की कुंजी मुझे मिल जाएगी...!!!
मै चला.................जीने !!.................... अपने सपनो को जीवन में पिरोने........!!
Monday, October 4, 2010
Aaj fir kai dino ke baad............
आज फिर कई दिनों के बाद,
दिल कर आया इस मनचली स्याही का , चखे ये इस संजीदे पन्ने का स्वाद,
जो कभी होता नित्य था वोही बन गया है इस आपाधापी में अपवाद,
आज फिर कई दिनों के बाद...
आज फिर कई दिनों के बाद ....
मैंने खोले पट सपनो से सुसज्जित कुछ नयी उम्मीदों के,
मन के अंकुर ने दिया जन्म , फिर जीवंत हुई एक नयी शुरुआत,
आज फिर कई दिनों के बाद......
आज फर कई दिनों के बाद....
रंगों में उँगलियाँ डुबोने को मन कर आया है,
अचानक ही होकर बेसुध , बेफिक्र और बेबाक,
आज फिर कई दिनों के बाद......
आज फिर कई दिनों के बाद....
इस अलसाई कलम को ठीक करते लग गए है उँगलियों पर स्याही के कई निशान,
वहीँ जहाँ और लगे है एक दूसरी लिखावट के दाग , मिटाएंगे मेरे मन का अज्ञान,
आज फिर कई दिनों के बाद....
आज फिर कई दिनों के बाद ,
देख झलक अतुलित भारत की, पुलकित ह्रदय में उत्त्पन्न हुआ उन्माद,
नेत्रों से जो दृश्य दिखे आत्मा तक सींचित कर गए भारतीय होने का एहसास,
आज फिर कई दिनों के बाद !!
आज फिर कई दिनों के बाद,
आज फिर कई दिनों के बाद.......
Thursday, February 4, 2010
कब आख़िर कब ??
वेदना की अग्नि पर फ़िर गिरी , आन्सो की कुछ बूँद उस दिन
कोहरा छ्टने का इंतज़ार कर रहे थे कई तमाशबीन उस दिन ॥पड़ा था पथ पर लथपथ , बालक गरीब माँ का ।
वास्तव में था यह न्याय हमारे इस सभ्य समाज का ॥आदर्शो को त्याग कर , भूख की मार से ।
शिक्षा को नकार के गरीबी के वार से॥पेट की ज्वाला को रोटी से , शांत करने का जो प्रयास किया।
चुराते रोटी देख एक सभ्य सामाजिक चोर ने अटहास किया ॥दौडे इस खोखले न्याय के उतने ही खोखले रक्षक !
हम आप और हमारे जैसे ही , मानवता के अप्रत्यक्ष भक्षक॥
भागते भागते कदम उस बालक के पत्थर से टकरा गए ।
हुआ आघात गहरा ,तब तक लोग वहां आ गए ॥
रोटी गिरी दूर झटक कर , नेत्रों से ओझिल हुई ।
भूख मिटाने की आशा एक बार फिर बोझिल हुई॥
आघात लगातार , अत्याचार लगातार , खोज भी लगातार थी।
चोटे लगातार थी तो , रोटी की तलाश भी लगातार थी॥
इससे पहले रोटी तक पहुचता वोह , मृत्यो आ पहुची वहां।
हुआ वियोग में रुन्दन कहीं , कहीं इस न्याय की जय जय कार हुई॥
माँ के नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धरा बही जा रही थी।
हमारी सच्चाई की परख और न्यायपूर्ण अत्याचार को दर्शा रही थी॥
क्या कहूँ , किस्से कहूँ ? स्वयं भी तो था उन्ही तमाशबीनो में।
गिनती मेरी भी थी उन्ही न्याय के मूक और झूठी तस्वीरो में ॥
उस दिन से आज तक अंतरात्मा , कुओं मुझे है धिक्कार रही?
ऐसा प्रतीत होता है मानो , हर सिसकी हर करह चाहो ओर से दोष है डाल रही ॥
" कब तक आखिर कब तक, चुपचाप देख्नेगे हम यह सब ?
अत्याचार के खिलाफ उठेगी आवाज़ कब , आखिर कब??
मौन टूटेगा कब ? कब वास्तव में न्याय होगा ?
कब न्याय निष्पक्ष , निष्पाप और वास्तव में न्याय होगा ??"
अत्याचार के खिलाफ उठेगी आवाज़ कब , आखिर कब??
मौन टूटेगा कब ? कब वास्तव में न्याय होगा ?
कब न्याय निष्पक्ष , निष्पाप और वास्तव में न्याय होगा ??"
कब आखिर कब ......कब आखिर कब......
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