Thursday, February 4, 2010

कब आख़िर कब ??

वेदना की अग्नि पर फ़िर गिरी , आन्सो की कुछ बूँद उस दिन
कोहरा छ्टने का इंतज़ार कर रहे थे कई तमाशबीन उस दिन ॥

पड़ा था पथ पर लथपथ , बालक गरीब माँ का ।
वास्तव में था यह न्याय हमारे इस सभ्य समाज का ॥

आदर्शो को त्याग कर , भूख की मार से ।
शिक्षा को नकार के गरीबी के वार से॥

पेट की ज्वाला को रोटी से , शांत करने का जो प्रयास किया।
चुराते रोटी देख एक सभ्य सामाजिक चोर ने अटहास किया ॥

दौडे इस खोखले न्याय के उतने ही खोखले रक्षक !
हम आप और हमारे जैसे ही , मानवता के अप्रत्यक्ष भक्षक॥

भागते भागते कदम उस बालक के पत्थर से टकरा गए ।
हुआ आघात गहरा ,तब तक लोग वहां आ गए ॥

रोटी गिरी दूर झटक कर , नेत्रों से ओझिल हुई ।
भूख मिटाने की आशा एक बार फिर बोझिल हुई॥

आघात लगातार , अत्याचार लगातार , खोज भी लगातार थी।
चोटे लगातार थी तो , रोटी की तलाश भी लगातार थी॥

इससे पहले रोटी तक पहुचता वोह , मृत्यो आ पहुची वहां।
हुआ वियोग में रुन्दन कहीं , कहीं इस न्याय की जय जय कार हुई॥

माँ के नेत्रों से अश्रुओं की अविरल धरा बही जा रही थी।
हमारी सच्चाई की परख और न्यायपूर्ण अत्याचार को दर्शा रही थी॥

क्या कहूँ , किस्से कहूँ ? स्वयं  भी तो था उन्ही तमाशबीनो में।
गिनती मेरी भी थी उन्ही न्याय के मूक और झूठी तस्वीरो में ॥

उस दिन से आज तक अंतरात्मा , कुओं मुझे है धिक्कार रही?
ऐसा प्रतीत होता है मानो , हर सिसकी हर करह चाहो ओर से दोष है डाल रही ॥

" कब तक आखिर कब तक, चुपचाप देख्नेगे हम यह सब ?
अत्याचार के खिलाफ उठेगी आवाज़ कब , आखिर कब??

मौन टूटेगा कब ? कब वास्तव में न्याय होगा ?
कब न्याय निष्पक्ष , निष्पाप और वास्तव में न्याय होगा ??"


कब आखिर कब ......कब आखिर कब......

1 comment:

  1. It is a tragedy of sorts , our nation seems to be in celeberation mood , most of the times , inspite of the hunger , poverty and
    shamelessness roaming around us ...

    It is a moving depiction, precise and piercing words .. apt and suited ..

    Do write more mate ;)

    ReplyDelete