Sunday, November 8, 2009

'अश्रु'

मन से निकले नेत्रों से बहे , भावनाऔं की भक्ति है ।
अनकही , अनसुनी , असुल्झी , सुल्झनो की जीवंत अभिव्यक्ति है ।

रूप विस्तृत बूंदों से सजे हुए , भाव व्यापक अनभिज्ञता से ढके हुए ।
जब बहना ही है तो क्यों सुन्दरता के उत्त्कर्ष पर पलते हैं?

जल जीवन है तो अश्रु जीवन से निर्मित जीवन धारा ।
आसुओं की नमी में है जीवन का सत्य समाहित सारा ।

प्यास बुझाने भावनाओं की , समय के धरातल पर गिरते हैं ।
छुपते छिपाते उजागर होते , जीवन की रेट में मिट्ते है ।

महका यह आँख का पानी , भावावेश को करता प्रतिपादित ।
व्यक्त करता जीवन चक्र को , शब्द महत्व को करता आच्छादित ।

हर अंश में है समाये यह अश्रु , वेदना का भार कुछ ।
इसलिए ले लेता है चक्षुओं से अलग होते ही बूंद का आकार कुछ ।

वेदना की भार प्रमुख , गर्भ में ... अश्रुओं के अन्तः कर्ण में समाये
निकलते ही आंखों से अश्रुबून्द के शिखर तक यह सिमट जाए ।

जब गिरती हुई आघात पर , यह बूंदे विखण्डित हो जाती हैं ...
दर्द को बाँट कर वेदना के अस्तित्व को मिटाती हैं ।

सागर को खारा इन बूंदों ने तो नही किया ?
इतना दर्द क्या दुनिया में पलता है ?

नही ! कहो यह हर्ष के है , आंसू हैं ,
दुःख भी तो आख़िर खुशी के आगमन से ही सजता है ।

अश्रुओं के कण कण में है , सुख का प्रतिबिम्ब समाया ।
भौतिकता में लीनं हमारा मन ही इसे पहचान न पाया ।

मन से निकले , नेत्रों से बहे , सुखद भावनाओं की भक्ति है ।
अनकही , अनसुलझी , अस्पष्ट सुखो की अप्रत्यक्ष जीवंत अभिव्यक्ति है ।

दुख का आच्च्च्दन ओढे , सुखों की अविरल जीवन जल पंक्ति है।
यह अश्रु ही जीवन है , शक्ति है , शक्ति है , शक्ति है !!

1 comment:

  1. Kya baat hai Sir.... tussi to chha gaye... but ek hi post kyun keep posting so that we can keep reading and enjoying........

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