Thursday, May 19, 2011

अंतर्द्वंध

शब्द जब विमुख हों , अर्थ जब प्रथक हों,


प्रयास जब अथक हों, परिणाम जब विफल हों,

सिहरन भी जब मृदुल हो , सिसकी भी जब प्रबल हो,

भावनाएँ जब मिथक हों, स्वार्थ जब सफल हो,

इन्द्रधनुष भी जब श्याम हो, रौशनी भी जब अन्धकार हो,

विचारों पर जब व्यवहारिकता का पाश हो, जब संरचना में भी नाश हो,

जब साँसों पे भी बंदिश तमाम और सृजन्तामकता पर अंकुश आम हो,

जब अश्रु भी बंजर हों, जब सपने भी सीले हों,

प्रहार भी जब कोमल हों, मलहम  में भी जब कीले हों,

पसीना भी जब क्रत्रिम हो, थकान में भी जब स्फूर्ति हो,

बचपन भी जब चालाक हो, ममता भी बस झूठी मूर्ती हो,

प्यार जब बस एक शब्द हो , ख्वाहिशे भी जब तृप्त हो,

जब नींद में भी आलस हो, जब अधरों पर हमेशा ही एक प्यास हो,

जब शरीर और आत्मा का सम्बन्ध मात्र कार्यात्मक स्वाश हो,

जब लों में भी केवल अँधेरे का ही प्रतीक हो, जब किरने बस अतीत हों,

जब स्वरों का माधुर्य भी चीख हो , जब आश्रय भी भीख हो,


क्या तब अंतर्द्वंध की स्थिति स्वाभाविक नहीं है...??
प्राण को सांसारिक विघनों से बचाता क्या येही अंतर्द्वंध वास्तव में नाविक नहीं है...................??
क्या येही अंतर्द्वंध वास्तव में नाविक नहीं है...................?? शायद हाँ........

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