उड़ान मेरे सपनो की , संसाधनों की परिधि लांघ गई
विजयश्री की कल्पना , बिखरी आकांक्षाओ को बाँध गई
कदमो पर अब किन्तु -परन्तु का जोर नहीं , विकल्पों पर अब कोई शोध नहीं
सपनो में सतरंगी -अतरंगी रंग बिखरे, तस्वीर पूर्ण होने में अब अवरोध नहीं.
अपने विचारो की इस विचलता पर अब मेरा आधिपत्य है
शंकाओ को धूमिल करते , मेरे सपने ही मेरा सत्य है
विद्रोह के स्वर हों मुखर , होते रहे , प्रलोभनों की अब सम्भावना नहीं,
जो निश्चय किया है मन ने , निश्चित उसकी सदभावना वही .
मेरे निश्चय , मेरे कर्म , मेरी ही होगी जवाबदेहि पूर्ण,
पोषित करूँगा , रोपित करूँगा , प्रगति का यह कोमल भ्रूण.
अभी तो हर्षित हुआ ह्रदय है , उपलब्धि के सपनो से,
मुझको न व्यर्थ समझे - समझाये , कह दो सभी हितैषी अपनों से.
उज्वल अभिषेक माथे पे , शोभित होते चन्दन , रोली और अक्षत
प्रज्वलित आकांक्षाएं ह्रदय में , लक्षित होते सागर , गगन और पर्वत.
सर जी, कविता एकदम सटीक है आपके जीवन के सत्य का पूरा व्यवरण करती है...
ReplyDeleteबोहत खूब... ऐसे ही चलते रहिये बस जीवन पथ पर, हम सबको प्रेरणा देते हुए...