Monday, September 3, 2012

नयी व्याख्या

जवाबों के सवाल तलशता दिखाई देता हूँ ,

मै मुद्दों की गांठों को और उलझाए लेता हूँ 

परेशां कर सब्र को , मै श्रद्धा  को तर्क- वितर्क के कटघरे में ले आया हूँ ,


जलती चिताओं के इस मरघट पर , मै खुद की परझाई का ही साया हूँ।


सोचता हूँ,और सोचता हूँ , और ज्यादा सोचता हूँ,


टूटता हूँ, और  टूटता  हूँ और ज्यादा टूटता हूँ।


बिखरता हूँ , संभालता हूँ, एक  डोर में पिरोया जाता हूँ,


मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।




तैरते हैं चारो तरफ , कई मुश्किल जवाबों के आसन सवाल,


मै  फिर भी तलाशता हूं , गहराईयों में उनकी सरलता का हाल।

मै  केवल मै मे ही  सिमट के तो नहीं रह गया हूँ?

वो केवल उसमे ही तो ठिठक के नहीं रह गया है?

हम चले तो साथ थे इस सफ़र में , शगुफ्ता मंजिल भी वो  एक ही  शायद  थी,

उस पर तो आज तलक यकीन है , यकीनन रास्ते ही कट के अलग निकल गए है 

मै रुकता हूँ ,  तलाशता  हूँ , और उस अकेले दरख़्त के तले सुस्ताता हूँ,


मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।



मै अपने पसीने में ही रक्त की तासीर महसूस हूँ करता,

निर्भय मन और निर्भय प्रयतन , फिर क्यों  अपनी साँसों से हूँ  डरता ?

यह कैसा विरोधाभास है ? कैसी अतृप्त यह विस्तृत आस है?

प्राण  ही है मात्र  स्वछंद  , बाकि केवल हाड मॉस के पात्र है।

मुझे नहीं है बंधना व्यवहारिकता के पाशों में,

बाजी मेरी, पत्ते मेरे - अर्थ है ही नहीं झूठे ताशो में।


मै गिरता हूँ , मै संभालता हूँ और मै फिर बिना सहारे उठता हूँ,

मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।



Friday, March 16, 2012

हम

तुम छाँव मेरी , तुम धूप भी,
तुम आत्मा मेरी, तुम उसका रूप भी,
तुम अंत एक तलाश का ,तुम सपनो की शुरुआत,  भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी.

तुम पंख भी , तुम उड़ान भी,
तुम शोभा  भी , तुम सम्मान भी,
तुम खुशबु भी, तुम कोमल एहसास भी
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी. 

तुम धुंध भी , तुम ओस भी, 
तुम कम्पन भी , तुम जोश भी,
तुम कृति भी, तुम प्रयास भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी.  

तुम श्रद्धा भी, तुम उपासना भी,
तुम विश्वास भी, तुम आस्था भी
तुम विद्या भी, तुम ज्ञान भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी.

तुम आइना भी, तुम परछाई भी,
तुम श्वास भी, तुम प्राण भी,
तुम तपिश भी, तुम प्यास भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी. 

तुम कोलाहल भी, तुम मुस्कान भी,
तुम दर्द भी , तुम ही मलहम, तुम घाव भी,
तुम सिरहन भी, तुम भिक्षा भी, तुम दान भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी. 

तुम सब कुछ , तुम कुछ ख़ास भी,
तुम मासूमियत भी, तुम मुस्कान भी,
तुम सीली आग भी, तुम एक कयास भी,
मै हूँ तुम, तुम मैं, हैं दूर भी और पास भी.  


मै हूँ तुम भी, तुम हो मै भी,
शरीर भी, पहचान भी, प्रेम और ध्यान भी, 
हम दोनों अब है हम ही,
न तुम न मै, बस दोनों एक जान ही !!


Monday, January 16, 2012

सपनो की उड़ान


उड़ान मेरे सपनो की , संसाधनों की परिधि लांघ गई
विजयश्री की कल्पना , बिखरी आकांक्षाओ को बाँध गई

कदमो पर अब किन्तु -परन्तु का जोर नहीं , विकल्पों पर अब कोई शोध नहीं 
सपनो में सतरंगी -अतरंगी  रंग बिखरे, तस्वीर पूर्ण होने में अब अवरोध नहीं.

अपने विचारो की इस विचलता पर अब मेरा आधिपत्य है
शंकाओ को धूमिल करते , मेरे सपने ही मेरा सत्य है
 
विद्रोह के स्वर हों  मुखर , होते रहे , प्रलोभनों की अब सम्भावना नहीं,
जो निश्चय किया है मन ने , निश्चित उसकी सदभावना वही .
 
मेरे निश्चय , मेरे कर्म , मेरी ही होगी जवाबदेहि पूर्ण,
पोषित करूँगा , रोपित करूँगा , प्रगति का यह कोमल भ्रूण.
 
अभी तो हर्षित हुआ ह्रदय है , उपलब्धि के सपनो से,
मुझको न व्यर्थ  समझे - समझाये , कह दो सभी हितैषी अपनों से.
 
उज्वल अभिषेक माथे पे , शोभित होते चन्दन , रोली और अक्षत
प्रज्वलित आकांक्षाएं ह्रदय में , लक्षित होते सागर  , गगन और पर्वत.