जवाबों के सवाल तलशता दिखाई देता हूँ ,
मै मुद्दों की गांठों को और उलझाए लेता हूँ ।
परेशां कर सब्र को , मै श्रद्धा को तर्क- वितर्क के कटघरे में ले आया हूँ ,
जलती चिताओं के इस मरघट पर , मै खुद की परझाई का ही साया हूँ।
सोचता हूँ,और सोचता हूँ , और ज्यादा सोचता हूँ,
टूटता हूँ, और टूटता हूँ और ज्यादा टूटता हूँ।
बिखरता हूँ , संभालता हूँ, एक डोर में पिरोया जाता हूँ,
मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं की नयी व्याख्या को पाता हूँ।
तैरते हैं चारो तरफ , कई मुश्किल जवाबों के आसन सवाल,
मै फिर भी तलाशता हूं , गहराईयों में उनकी सरलता का हाल।
मै केवल मै मे ही सिमट के तो नहीं रह गया हूँ?
वो केवल उसमे ही तो ठिठक के नहीं रह गया है?
हम चले तो साथ थे इस सफ़र में , शगुफ्ता मंजिल भी वो एक ही शायद थी,
उस पर तो आज तलक यकीन है , यकीनन रास्ते ही कट के अलग निकल गए है ।
मै रुकता हूँ , तलाशता हूँ , और उस अकेले दरख़्त के तले सुस्ताता हूँ,
मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं की नयी व्याख्या को पाता हूँ।
मै अपने पसीने में ही रक्त की तासीर महसूस हूँ करता,
निर्भय मन और निर्भय प्रयतन , फिर क्यों अपनी साँसों से हूँ डरता ?
यह कैसा विरोधाभास है ? कैसी अतृप्त यह विस्तृत आस है?
प्राण ही है मात्र स्वछंद , बाकि केवल हाड मॉस के पात्र है।
मुझे नहीं है बंधना व्यवहारिकता के पाशों में,
बाजी मेरी, पत्ते मेरे - अर्थ है ही नहीं झूठे ताशो में।
मै मुद्दों की गांठों को और उलझाए लेता हूँ ।
परेशां कर सब्र को , मै श्रद्धा को तर्क- वितर्क के कटघरे में ले आया हूँ ,
जलती चिताओं के इस मरघट पर , मै खुद की परझाई का ही साया हूँ।
सोचता हूँ,और सोचता हूँ , और ज्यादा सोचता हूँ,
टूटता हूँ, और टूटता हूँ और ज्यादा टूटता हूँ।
बिखरता हूँ , संभालता हूँ, एक डोर में पिरोया जाता हूँ,
मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं की नयी व्याख्या को पाता हूँ।
तैरते हैं चारो तरफ , कई मुश्किल जवाबों के आसन सवाल,
मै फिर भी तलाशता हूं , गहराईयों में उनकी सरलता का हाल।
मै केवल मै मे ही सिमट के तो नहीं रह गया हूँ?
वो केवल उसमे ही तो ठिठक के नहीं रह गया है?
हम चले तो साथ थे इस सफ़र में , शगुफ्ता मंजिल भी वो एक ही शायद थी,
उस पर तो आज तलक यकीन है , यकीनन रास्ते ही कट के अलग निकल गए है ।
मै रुकता हूँ , तलाशता हूँ , और उस अकेले दरख़्त के तले सुस्ताता हूँ,
मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं की नयी व्याख्या को पाता हूँ।
मै अपने पसीने में ही रक्त की तासीर महसूस हूँ करता,
निर्भय मन और निर्भय प्रयतन , फिर क्यों अपनी साँसों से हूँ डरता ?
यह कैसा विरोधाभास है ? कैसी अतृप्त यह विस्तृत आस है?
प्राण ही है मात्र स्वछंद , बाकि केवल हाड मॉस के पात्र है।
मुझे नहीं है बंधना व्यवहारिकता के पाशों में,
बाजी मेरी, पत्ते मेरे - अर्थ है ही नहीं झूठे ताशो में।
मै गिरता हूँ , मै संभालता हूँ और मै फिर बिना सहारे उठता हूँ,
मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं की नयी व्याख्या को पाता हूँ।
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