तैयार रहता हूँ मै तो कागज़ , कलम और विचार लिए , बस मुझे शीर्षक नहीं मिलता.
मैं ह्रदय मे हथेली को सुस्ता कर , ताकता रहता हूँ पर यह सूरज नहीं ढलता,
छुप जाता है यह सूरज बादलों में , तो मांग के बिखरे सिंदूर सा नज़र आता है,
माथे पे सजी बिंदी का स्वरुप लिए , फिर उजले आकाश में शोभित हो जाता है.
कभी डूब गिरता सागर में , कभी बूंद बन बरसते भी देखा है इसको मैंने गागर में.
कभी शीतल, कभी सौम्य , तो कभी धधकते भी देखा है इसको हरित चादर पे.
क्यों नहीं है स्थिर इसका अस्तित्व ? क्यों नहीं है स्थाई इसका व्यक्तित्व?
क्यों व्याकुल रहता है यह हर पल ? क्यों नहीं लेता है निश्चय यह अटल?
क्यों बार बार नए रूप , नए स्वाभाव , नए रंग , नए चरित्र में नज़र आता है?
हर पिछली समझ पे इसकी नवीनता का अंश हावी सा होता जाता है।।
यह अस्थायित्व ही कहीं इसकी शक्ति तो नहीं ? जीवन में ख़ुशी ही 'बचपने की तख्ती' तो नहीं ?
लिखते रहो कुछ भी , गलत सही की फ़िक्र नहीं ... पर आज न खड़िया और न गीले कपडे का जिक्र नहीं।
सब कुछ एक निश्चित अनुक्रम में हो सुसाज्जित, प्रकृति की तो नही ऐसी विषिष्टता,
इसका सौंदर्य, इसका अनूठापन , इसकी उतकृष्टता है - इसकी अस्त-व्यस्त अव्यवस्थिता।
शब्द हो, विचार हों , भावनाएँ हो, संवेदनाएँ हो, एहसास हो, विश्वास हो , प्यार हो , दर्द हो . .
उँगलियों में हमेशा कलम, व्यस्तताओं में कुछ वक़्त और खाव्बों में मेरे ताबीर हो ..
क्रम हो न हो . .श्रृंगार हो न हो . . लेखनी में मेरी हमेशा व्यक्त करने की कूबत और आस हो
उस मिथ्यापूर्ण शीर्षक की अब मुझे तलाश नहीं . .मेरे विचारों, मेरी स्याही पे अब कोई पाश नहीं।।
मैं ह्रदय मे हथेली को सुस्ता कर , ताकता रहता हूँ पर यह सूरज नहीं ढलता,
छुप जाता है यह सूरज बादलों में , तो मांग के बिखरे सिंदूर सा नज़र आता है,
माथे पे सजी बिंदी का स्वरुप लिए , फिर उजले आकाश में शोभित हो जाता है.
कभी डूब गिरता सागर में , कभी बूंद बन बरसते भी देखा है इसको मैंने गागर में.
कभी शीतल, कभी सौम्य , तो कभी धधकते भी देखा है इसको हरित चादर पे.
क्यों नहीं है स्थिर इसका अस्तित्व ? क्यों नहीं है स्थाई इसका व्यक्तित्व?
क्यों व्याकुल रहता है यह हर पल ? क्यों नहीं लेता है निश्चय यह अटल?
क्यों बार बार नए रूप , नए स्वाभाव , नए रंग , नए चरित्र में नज़र आता है?
हर पिछली समझ पे इसकी नवीनता का अंश हावी सा होता जाता है।।
यह अस्थायित्व ही कहीं इसकी शक्ति तो नहीं ? जीवन में ख़ुशी ही 'बचपने की तख्ती' तो नहीं ?
लिखते रहो कुछ भी , गलत सही की फ़िक्र नहीं ... पर आज न खड़िया और न गीले कपडे का जिक्र नहीं।
सब कुछ एक निश्चित अनुक्रम में हो सुसाज्जित, प्रकृति की तो नही ऐसी विषिष्टता,
इसका सौंदर्य, इसका अनूठापन , इसकी उतकृष्टता है - इसकी अस्त-व्यस्त अव्यवस्थिता।
शब्द हो, विचार हों , भावनाएँ हो, संवेदनाएँ हो, एहसास हो, विश्वास हो , प्यार हो , दर्द हो . .
उँगलियों में हमेशा कलम, व्यस्तताओं में कुछ वक़्त और खाव्बों में मेरे ताबीर हो ..
क्रम हो न हो . .श्रृंगार हो न हो . . लेखनी में मेरी हमेशा व्यक्त करने की कूबत और आस हो
उस मिथ्यापूर्ण शीर्षक की अब मुझे तलाश नहीं . .मेरे विचारों, मेरी स्याही पे अब कोई पाश नहीं।।