Saturday, February 2, 2013

शीर्षक की तलाश

तैयार रहता हूँ मै तो कागज़ , कलम और विचार लिए , बस मुझे शीर्षक नहीं मिलता.
मैं ह्रदय मे हथेली  को सुस्ता कर ,  ताकता रहता हूँ पर यह सूरज नहीं ढलता,

छुप जाता है यह सूरज बादलों में ,  तो  मांग के बिखरे सिंदूर  सा नज़र आता है,
माथे पे सजी बिंदी का स्वरुप लिए , फिर उजले आकाश में शोभित हो जाता है.

कभी डूब गिरता सागर में , कभी बूंद बन बरसते  भी देखा है इसको मैंने गागर में.
कभी शीतल, कभी सौम्य , तो कभी धधकते  भी देखा है इसको हरित चादर पे.
 
क्यों नहीं है स्थिर इसका अस्तित्व ? क्यों नहीं है स्थाई इसका व्यक्तित्व?
क्यों व्याकुल रहता है यह हर पल ? क्यों नहीं लेता है निश्चय यह अटल?

क्यों  बार बार नए रूप , नए स्वाभाव , नए रंग  , नए चरित्र  में नज़र आता है?
हर पिछली समझ पे इसकी नवीनता का अंश हावी सा होता जाता है।।

यह  अस्थायित्व ही कहीं इसकी शक्ति तो नहीं ? जीवन में ख़ुशी ही 'बचपने की तख्ती' तो नहीं ?
लिखते रहो कुछ भी , गलत सही की फ़िक्र नहीं ... पर आज न  खड़िया और न गीले कपडे का जिक्र नहीं।

सब कुछ एक निश्चित अनुक्रम में हो सुसाज्जित,  प्रकृति की तो  नही ऐसी विषिष्टता,
इसका सौंदर्य,  इसका अनूठापन , इसकी उतकृष्टता है -  इसकी अस्त-व्यस्त अव्यवस्थिता।

शब्द हो, विचार हों , भावनाएँ हो, संवेदनाएँ हो, एहसास हो, विश्वास हो , प्यार हो , दर्द हो . . 
 उँगलियों में हमेशा कलम, व्यस्तताओं में कुछ वक़्त और खाव्बों में मेरे ताबीर हो ..

क्रम हो न हो . .श्रृंगार हो न हो  . . लेखनी में मेरी हमेशा व्यक्त करने की कूबत और आस हो 
उस मिथ्यापूर्ण  शीर्षक की अब मुझे तलाश नहीं . .मेरे विचारों, मेरी स्याही पे अब कोई पाश नहीं।।


 
 

No comments:

Post a Comment