एक बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो.
एक अलाव जो जलाई थी उस सर्द सियाह रात मे,
धुंध है तो होने दो , दुआ करो सहर तक उसमे आग ही आग हो.
मिले थे जो हाथ और दिल वो आज तलक आबाद हो.
वो गलतफेहमियां , वो तल्खियां - नाशाद हो.
Is नये दिन ,नयी परिकल्पनाओं की बात हो.
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो.
ना मंदिर ,ना मस्जिद ,ना दारू ना पैसा.
ना हिंसा, ना स्वार्थ , ना ऐसा ना वैसा.
ना ये ना वो...is परिवर्तन के मुखिया ...
बस आप ही आप हो!
सौंप दिया है , जनता ने , लोकतंत्रा के करता ने
परचम अब विपक्ष का , आम आदमी के पक्ष का.
इमानदारी के स्तंभ का, सत्ता के दंभ का
संगठन की शक्ति का , स्वराज के लक्ष्य का,
प्रगती के path का, सुशाशन के दक्ष का,
अब बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो.
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