Wednesday, January 29, 2014

बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

कोशिशे जब पसीने मे सनी ,  छोड़ रही हो उमींदो का साथ,
अपनी थक चुकी चाल से , कहता हूँ बस ये ही बात, 
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

प्रयास जब असफलताओं की चौखट पे लेते है कुछ आखिरी साँस,
अपने निराश मन को , फुसलाता हूँ दे कर ये ही आस,
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

ये चिलमिलाती धूप जब इस लम्बी राह पर परखती है मुझे, होकर निर्मोही,
मंज़िलो को है इंतेज़ार ये आस , और ये बात दोहराता हुआ चलता है बटोही..
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

बारहा मन करता है, लौट चलूँ वापस. 
कैसा ये संघर्ष , किस प्रयोजन का ये अंतहीन आत्म-विमर्श ?
बारहा करता हूँ खुद के निर्णय को नग्न - व्यवहारिकता की बिसात पे.
उलझ जाता हूँ उलझनो मे मग्न , असफलताओं और निष्क्रियता के आघात पे.

पर फिर यकायक ही , कोई जानी- पेहचानी अपनी ही सी आवाज़ ...
                कहती है मुझसे  -

अब मत हार , भर हुंकार , दबोच के साहस के विस्तार 
बढ़ता चल , गिरता चल , संभालता चल , उठता चल,
चलता चल - तू अब बस चलता चल.
थोड़ा और ....थोड़ा और...

बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...


Sunday, January 19, 2014

शुरुआत



एक बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो. 


एक अलाव जो जलाई थी उस सर्द सियाह रात मे,
धुंध है तो होने दो , दुआ करो सहर तक उसमे आग ही आग हो.

मिले थे जो हाथ और दिल वो आज तलक आबाद हो.
वो गलतफेहमियां , वो तल्खियां  -  नाशाद हो.

Is नये दिन ,नयी परिकल्पनाओं की बात हो.
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो. 

ना मंदिर ,ना मस्जिद ,ना दारू ना पैसा.
ना हिंसा, ना स्वार्थ , ना ऐसा ना वैसा.

ना ये ना वो...is परिवर्तन के मुखिया ...
बस आप ही आप हो!


सौंप दिया है , जनता ने , लोकतंत्रा के करता ने
परचम अब विपक्ष का , आम आदमी के पक्ष का.
इमानदारी के स्तंभ का, सत्ता के दंभ का
संगठन की शक्ति का ,  स्वराज के लक्ष्य का,
प्रगती के path का, सुशाशन के दक्ष का,
अब बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो.