Tuesday, April 9, 2019

मैं उन्हें सिखाना  चाहता हूँ  , मैं उन्हें पढ़ना चाहता हूँ ,
क्या मैं उनको खुद के जैसा बनाना चाहता हूँ?
केवल इसलिए की मैं, शिक्षा पद्वति से असंतुस्ट  हूँ -
एक नए नाम से उसी पद्वति की एक नयी छवि बनाना चाहता हूँ ?

क्या है जीवन , क्या लक्ष्य , kya है आखिर उसका मर्म ?
इन कठिन सवालों के सरल जवाब , क्या उनको रटाना चाहता हूँ ?
केवल इसलिए की मैं, शिक्षा पद्वति से असंतुस्ट  हूँ -
एक नए नाम से उसी पद्वति की एक नयी छवि बनाना चाहता हूँ ?

क्या अपने संघर्षो , अपने निर्णयों को जीवन का केंद्र बना , उनको सही ठहरना  चाहता हूँ ?
क्या मैं अपने आदर्शो को अविवाद्य सिद्धांत बना कर अपनी शाला में दर्शाना चाहता हूँ ?
केवल इसलिए की मैं, शिक्षा पद्वति से असंतुस्ट  हूँ -
एक नए नाम से उसी पद्वति की एक नयी छवि बनाना चाहता हूँ ?

असंभव है अंतर शायद अपनी पहचान से कर पाना अपने आप को।
बहुत कठिन है अंतर करना शायद अपनी प्रतिबद्धताओं का अपने काम को
शायद इस बोध की स्वीकृति ही सबसे जरूरी काम है
इस मोड़ पे फिलहाल मेरे लिए एहि सबसे महत्वपीर्ण आयाम है 

Monday, August 27, 2018

कानपुर  वाले  मामा की गोदरेज़ की अलमारी पे ,
चिपके हुए स्टीकर ने बतलाया था मुझको यह पहली बारी
सबको देखा सबको परखा अब है भाजपा की बारी।
गौ रक्षा की आढ़ में जीव हत्या, विकास के नाम पे योगी,हिंदुत्व और राम मंदिर,
लोकतान्त्रिक संस्थानों की नीतिगत लाचारी
मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

लखनऊ की शामो का मिजाज़ कुछ ऐसा है
की चाय के साथ राजनीती के बिस्किट अक्सर डुबाए जाते है.
चाहे न चाहे हर किसी को भारतीय राजनीती के पाठ
और धर्म से राजनीती का अटूट रिश्ते से वाकिफ़ कराए जाते है.
शिथिल वयवस्था को कोसते सुनते बशर्ते आए है , हम भी उम्र सारी ,
लेकिन मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

आपको बड़ी उमींदो से हिंदुस्तान ने चुन के भेजा था,
पर शायद हमारी 'हिंदुस्तान ' की परीभाषा ही समान न थी,
आपके लिए जो केवल भगवा था, वह तिरंगे की मेरी लिए पहचान न थी
क्योंकि आपको गद्दी तक लाने में एक वोट मेरा भी था
आपके तथाकथित विकास और स्पष्ट फांसीवाद में अंतर करना है दुविधा भारी
भाई मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

आपने कहा नोटबंदी करके आप भ्रष्टाचार मिटा डालेंगे,रॉबिनहुड बन के गरीबों के अकाउंट में पैसे डालेंगे,
यकीन जानिये हम संशय के बावजूद आपकी जुमले बाज़ी में बह गए।
आपकी छाती के साइज और आपके 'झोला लेके चल पड़ेंगे' के नारे में
हम भी एटीएम की लाइन्स हस्ते हुए सह गए।
नोटीबंदी तो इकॉनमी को ले डूबी ही , राजनीतिकी फंडिंग पे आपके यू -टर्न ने विदित कर दी है सच्चाई सारी
भ्रस्टाचार विरोधी  मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

आपने काश्मीर में बच्चों के चेहरे पेलेट गन्स से गुदवा दिए,
कश्मीरी को केवल इंडियन आर्मी  पर पत्थर फैकने बाले बना दिए,
घाटी में रिकॉर्ड सिविलियन और आर्मी पर्सनल की मृत्यु का क्या हुआ मक़सद
न आतंकवाद कम हुआ, न कश्मीरी के दिल में हिंदुस्तान के लिए नफ़रत
ज&क सरकार गठन से राजनीतिकी अवसरवादी जरूर हुई प्रत्यक्ष और देशहित के आगे आपकी राजनीतिक मक्कारी
समस्या निवारक- मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

अख़लाक़ जला, पहलु मरा , लिंचिंग की खबर हर जगह अंकित थी
लेकिन आपका मौन न टूटा,  गऊ माता तो आखिरकार सुरक्षित थी
गौ-मूत्र और गोबर के आगे इंसानी जीवन वह भी मुसलमान के जीवन का प्रश्न ही कहाँ
भले ही भारत उसी गौ -माता के मीट का अग्रणी निर्यातक हो,पर यह तो प्र्शन ही नहीं वहां
राजनीतिक रोटियों के सेकने के लिए गोबर तो कोई भी चलता है, उसमे बहुत नहीं परेशानी
धर्म निष्पक्ष मोदीजी - यह कैसा 'सबका साथ,सबका विकास'? यह कैसे हिंदुस्तान की है तैयारी ?

पहले गौरी को मारा, और फिर भौमिक , निश्छल बुख़ारी सब नाम इसमें जुड़ गए.
पर आप केवल तब ही बोले , केवल वही बोले , वैसे ही बोले - जो वोट की लिए जरूरी था.

Wednesday, January 29, 2014

बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

कोशिशे जब पसीने मे सनी ,  छोड़ रही हो उमींदो का साथ,
अपनी थक चुकी चाल से , कहता हूँ बस ये ही बात, 
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

प्रयास जब असफलताओं की चौखट पे लेते है कुछ आखिरी साँस,
अपने निराश मन को , फुसलाता हूँ दे कर ये ही आस,
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

ये चिलमिलाती धूप जब इस लम्बी राह पर परखती है मुझे, होकर निर्मोही,
मंज़िलो को है इंतेज़ार ये आस , और ये बात दोहराता हुआ चलता है बटोही..
बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...

बारहा मन करता है, लौट चलूँ वापस. 
कैसा ये संघर्ष , किस प्रयोजन का ये अंतहीन आत्म-विमर्श ?
बारहा करता हूँ खुद के निर्णय को नग्न - व्यवहारिकता की बिसात पे.
उलझ जाता हूँ उलझनो मे मग्न , असफलताओं और निष्क्रियता के आघात पे.

पर फिर यकायक ही , कोई जानी- पेहचानी अपनी ही सी आवाज़ ...
                कहती है मुझसे  -

अब मत हार , भर हुंकार , दबोच के साहस के विस्तार 
बढ़ता चल , गिरता चल , संभालता चल , उठता चल,
चलता चल - तू अब बस चलता चल.
थोड़ा और ....थोड़ा और...

बस थोड़ा और , बस थोड़ा और ...


Sunday, January 19, 2014

शुरुआत



एक बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो. 


एक अलाव जो जलाई थी उस सर्द सियाह रात मे,
धुंध है तो होने दो , दुआ करो सहर तक उसमे आग ही आग हो.

मिले थे जो हाथ और दिल वो आज तलक आबाद हो.
वो गलतफेहमियां , वो तल्खियां  -  नाशाद हो.

Is नये दिन ,नयी परिकल्पनाओं की बात हो.
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो. 

ना मंदिर ,ना मस्जिद ,ना दारू ना पैसा.
ना हिंसा, ना स्वार्थ , ना ऐसा ना वैसा.

ना ये ना वो...is परिवर्तन के मुखिया ...
बस आप ही आप हो!


सौंप दिया है , जनता ने , लोकतंत्रा के करता ने
परचम अब विपक्ष का , आम आदमी के पक्ष का.
इमानदारी के स्तंभ का, सत्ता के दंभ का
संगठन की शक्ति का ,  स्वराज के लक्ष्य का,
प्रगती के path का, सुशाशन के दक्ष का,
अब बदलाव की शशक्त शुरुआत हो,
ना मेरा ना तेरा , बस सचाई का साथ हो. 

Saturday, February 2, 2013

शीर्षक की तलाश

तैयार रहता हूँ मै तो कागज़ , कलम और विचार लिए , बस मुझे शीर्षक नहीं मिलता.
मैं ह्रदय मे हथेली  को सुस्ता कर ,  ताकता रहता हूँ पर यह सूरज नहीं ढलता,

छुप जाता है यह सूरज बादलों में ,  तो  मांग के बिखरे सिंदूर  सा नज़र आता है,
माथे पे सजी बिंदी का स्वरुप लिए , फिर उजले आकाश में शोभित हो जाता है.

कभी डूब गिरता सागर में , कभी बूंद बन बरसते  भी देखा है इसको मैंने गागर में.
कभी शीतल, कभी सौम्य , तो कभी धधकते  भी देखा है इसको हरित चादर पे.
 
क्यों नहीं है स्थिर इसका अस्तित्व ? क्यों नहीं है स्थाई इसका व्यक्तित्व?
क्यों व्याकुल रहता है यह हर पल ? क्यों नहीं लेता है निश्चय यह अटल?

क्यों  बार बार नए रूप , नए स्वाभाव , नए रंग  , नए चरित्र  में नज़र आता है?
हर पिछली समझ पे इसकी नवीनता का अंश हावी सा होता जाता है।।

यह  अस्थायित्व ही कहीं इसकी शक्ति तो नहीं ? जीवन में ख़ुशी ही 'बचपने की तख्ती' तो नहीं ?
लिखते रहो कुछ भी , गलत सही की फ़िक्र नहीं ... पर आज न  खड़िया और न गीले कपडे का जिक्र नहीं।

सब कुछ एक निश्चित अनुक्रम में हो सुसाज्जित,  प्रकृति की तो  नही ऐसी विषिष्टता,
इसका सौंदर्य,  इसका अनूठापन , इसकी उतकृष्टता है -  इसकी अस्त-व्यस्त अव्यवस्थिता।

शब्द हो, विचार हों , भावनाएँ हो, संवेदनाएँ हो, एहसास हो, विश्वास हो , प्यार हो , दर्द हो . . 
 उँगलियों में हमेशा कलम, व्यस्तताओं में कुछ वक़्त और खाव्बों में मेरे ताबीर हो ..

क्रम हो न हो . .श्रृंगार हो न हो  . . लेखनी में मेरी हमेशा व्यक्त करने की कूबत और आस हो 
उस मिथ्यापूर्ण  शीर्षक की अब मुझे तलाश नहीं . .मेरे विचारों, मेरी स्याही पे अब कोई पाश नहीं।।


 
 

Tuesday, January 1, 2013

एक वार्ता




"     वो ऐसे हैं  , वह वैसे हैं, और वह तो उनके ही जैसे है . .
      और उनकी  तो बस बात न पूछो , वह तो न जाने कैसे कैसे हैं।।

उन्हें ऐसा करना चाहिए , उन्हें वैसा नहीं करना चाहिए,
उन्होंने ऐसा किया पर उन्होंने तो वो कर दिया . . भला बताइए !!

       वो तो ऐसी नहीं थी , जरूर उसमे ही कोई कमी थी ... 
       वो तो दिखती थी अक्सर उसके साथ,  होगी जरूर कई बात !!

संस्कार भी तो कोई चीज़ है , यह पाश्चात्य संस्कृति भी अजीब है ,
अब हम तो कुछ कहते नहीं, अपना अपना नसीब है।

       वो सब तो पागल है, ऐसे थोड़ी कुछ बदलाव आता है।
       भाईसाहब , बिना मतलब के लाठी खाने कोई नहीं जाता है।

अजी साहब यह देश तो अब है गर्त में , सब साले चोर है .
आपको  संघर्ष करना चाहिए , प्रयास  ही सफलता की डोर है।   "


                                                                                                
.................. कौन मै ??

मै क्या करता हूँ ?  मैंने क्या किया ?
मैंने क्या  संजोया ?  मैंने क्या दिया ?

अरे यह सब भला मै क्यों सोचूँ ....
चलिए चलिए  बाजू हटिये

जिसको देखो आ जाता है कहने ....


आप  ऐसे हैं  , आप  वैसे हैं, और आप  तो उनके ही जैसे है . ...










Monday, September 3, 2012

नयी व्याख्या

जवाबों के सवाल तलशता दिखाई देता हूँ ,

मै मुद्दों की गांठों को और उलझाए लेता हूँ 

परेशां कर सब्र को , मै श्रद्धा  को तर्क- वितर्क के कटघरे में ले आया हूँ ,


जलती चिताओं के इस मरघट पर , मै खुद की परझाई का ही साया हूँ।


सोचता हूँ,और सोचता हूँ , और ज्यादा सोचता हूँ,


टूटता हूँ, और  टूटता  हूँ और ज्यादा टूटता हूँ।


बिखरता हूँ , संभालता हूँ, एक  डोर में पिरोया जाता हूँ,


मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।




तैरते हैं चारो तरफ , कई मुश्किल जवाबों के आसन सवाल,


मै  फिर भी तलाशता हूं , गहराईयों में उनकी सरलता का हाल।

मै  केवल मै मे ही  सिमट के तो नहीं रह गया हूँ?

वो केवल उसमे ही तो ठिठक के नहीं रह गया है?

हम चले तो साथ थे इस सफ़र में , शगुफ्ता मंजिल भी वो  एक ही  शायद  थी,

उस पर तो आज तलक यकीन है , यकीनन रास्ते ही कट के अलग निकल गए है 

मै रुकता हूँ ,  तलाशता  हूँ , और उस अकेले दरख़्त के तले सुस्ताता हूँ,


मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।



मै अपने पसीने में ही रक्त की तासीर महसूस हूँ करता,

निर्भय मन और निर्भय प्रयतन , फिर क्यों  अपनी साँसों से हूँ  डरता ?

यह कैसा विरोधाभास है ? कैसी अतृप्त यह विस्तृत आस है?

प्राण  ही है मात्र  स्वछंद  , बाकि केवल हाड मॉस के पात्र है।

मुझे नहीं है बंधना व्यवहारिकता के पाशों में,

बाजी मेरी, पत्ते मेरे - अर्थ है ही नहीं झूठे ताशो में।


मै गिरता हूँ , मै संभालता हूँ और मै फिर बिना सहारे उठता हूँ,

मै मिटने के साथ में अस्तित्व में आता हूँ , स्वयं  की नयी व्याख्या को पाता हूँ।